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"शिक्षित समाज” कहें ? या आत्मघाती समाज? :- Story in Hindi :- StoryKunj


वैश्य समाज के बच्चों के विवाह से जुड़ा ये एक चिंताजनक विषय है कि क्या हमारा वैश्य समाज अगली सदी तक रह पाएगा ?

वैश्य समाज के चारों ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देता है क्योंकि आज हालात यह बन रहे हैं कि.......

 बेटियाँ 30–35 की उम्र तक कुंवारी ।
बेटे भी 35 की उम्र पार कर चुके, लेकिन विवाह नहीं।
शादी होती भी है तो देरी से….......
बच्चे होते हैं तो एक ही…......
और फिर तलाक़ जैसे मामले भी बढ़ रहे हैं
परिवार टूट रहे हैं..…
बुजुर्ग माता-पिता अकेले...... 
और ऐसे ही चलता रहा तो ये पूरी पीढ़ी खोखली होने के आसार बन सकते हैं।

क्या हम इसे “शिक्षित समाज” कहें ? 
या आत्मघाती समाज?

 जनसंख्या घटने की चुपचाप चलती साजिश

एक उदाहरण से समझिए:
 आज वैश्य समाज में 100 लोग हैं = 50 जोड़े।
यदि हर जोड़ा सिर्फ एक ही संतान पैदा करता है
तो अगली पीढ़ी में अधिकतम 45-46 संतानें (कुछ निःसंतान जोड़े मान लें)।
फिर वे भी एक-एक संतान करें , तो अगली पीढ़ी में 20–22।
और तीसरी पीढ़ी में वैश्य समाज शून्य के करीब।

 यह कोई अनुमान नहीं , यह गणित है, और ऐसा कुछ हो चुका है !
आज  वैश्य समाज के गांव उजड़ चुके हैं।
शहरों में बड़ी-बड़ी इमारतें हैं, पर उनमें कोई संयुक्त हिन्दू परिवार नहीं बचा।

क्यों नई बहुएँ सिर्फ एक ही संतान चाहती हैं?
ताकि ज़िंदगी का “आनंद” ले सकें।
ताकि उनका करियर न रुके।
ताकि “डिलीवरी” में शरीर न बिगड़े।
और कहीं कोई “वांझोटी” न कहे, इसलिए बस एक बच्चा ........वो भी देर से।

 क्या यही धर्म है?
 क्या यही वैश्य समाज का भविष्य है?

सच यह है कि संतान अब ‘सामाजिक  प्रूफ’ की वस्तु बन चुकी है — स्नेह के प्रूफ की नहीं 

अर्थात 
 बच्चे अब प्रेम का परिणाम नहीं, अपितु वैश्य समाज को दिखाने की वस्तु बन चुके हैं। हम अपने बच्चों के विवाह में लाखों करोड़ों रुपए खर्च करके लोगों को दिखावा करते हैं यह सब ना करके अपने बच्चों के भविष्य के लिए व अपने बुढ़ापे के लिए धन का संचय करें। विवाह एक संस्कार है जिसे अपने घर परिवार की बीच बनाएंगे तो अधिक खुशियां मिलेंगी।

यह सोच मूल्यहीन है, धर्महीन है, और भविष्यविहीन है।

सबसे बड़ा दोष लड़की के पिता का है!
वही पिता, जिसने खुद 22–25 की उम्र में विवाह कर लिया था।
पत्नी के साथ समय बिताया, परिवार बसाया, संतान पाई।
आज वही पिता अपनी बेटी को 30 की उम्र तक कुंवारी रखता है ....
कभी बेटी के करियर के नाम पर तो कभी 
कभी “बढ़िया लड़का नहीं मिल रहा” कहकर,
तो कभी दहेज व प्रतिष्ठा का हवाला देकर।

 बेटी को सिर पर बैठाकर, आपने उसे रिश्तों से दूर कर दिया।
 अब वही बेटी अवसाद में, IVF में, या तलाक़ में जा रही है।

आज वैश्य समाज में क्या चल रहा है?
 विवाह की औसत आयु: लड़के – 32 वर्ष, लड़की – 29 वर्ष
 औसतन संतान: 1 या 0.5 प्रति दंपत्ति
 डिवोर्स रेट:- भारत में सबसे तेज़ वृद्धि दर हासिल कर रहा है वैश्य समाज में।
प्रजनन क्षमता की समस्या:- हर 4 में 1 दंपत्ति को संतान होने में समस्या ।
 विवाह योग्य युवक/युवतियाँ कुंवारे :— हज़ारों की संख्या में।

 वैश्य समाज के संस्थानों को भी आगे आना पड़ेगा...
 समाज के मूलभूत संकट पर चर्चा परिचर्चा करनी होंगी, समाज को जागना होगा, सामूहिक वैवाहिक सम्मेलनों का आयोजन भी बढ़ना होगा।

विवाह भी एक धार्मिक और सामाजिक कर्तव्य है — यह कोई सिर्फ शारीरिक बंधन मात्र नहीं है,
बल्कि वंश और धर्म की निरंतरता का माध्यम है।

हमने क्या किया? — एक आत्म-स्वीकृति
 बेटी को “राजकुमारी” बनाकर विवेक से वंचित किया।
 बेटे को जिम्मेदारी से दूर कर दिया।
पहले तो विवाह को टालते रहे,
और जब किया तो देरी से - शरीर साथ नहीं देता।

जब बच्चे हुए- तो सिर्फ एक।
और जब किसी कारण से रिश्ता बिगड़ा -
तो बेटी अकेली, बेटा टूट गया, और घर बिखर गया।

ऐसे में अब क्या करना होगा?

समय पर विवाह को अनिवार्य बनाएँ।

25 से पहले पुत्र का ओर 23 से पहले पुत्री का  विवाह हो जाना चाहिए।

 एक दो नहीं, कम से कम तीन चार संतानें — यह आवश्यक है। जितना बड़ा परिवार होगा उतनी अधिक खुशियां होगी उतने ही अधिक हम शक्तिशाली होंगे शक्ति का संचय अति आवश्यक है।

“बस एक बच्चा” — यह मानसिकता समाज को शून्यता की ओर ले जा रही है।

 वैश्य वर्ग के  प्रबुद्धजनो को सामाजिक विषयों पर बोलना ही होगा।

समाज का विनाश धर्म के विनाश से भी बड़ा खतरा है।

लड़की के पिता को अब सजग होना होगा, अपेक्षाएँ नहीं, समझदारी लानी होगी।
बेटी की ज़िंदगी बचानी है तो समय पर विवाह करने होगें।

अंतिम चेतावनी — अब भी नहीं चेते तो 
इतिहास में रह जाएगा ‘वैश्य समाज’

ना युवक होंगे, ना युवतियाँ
ना संतानें होंगी, ना संस्कार
ना समाज होगा, ना परिवार 
एक संतान अनेको रिश्ते-नाते (जैसे मामा, मौसी, बुआ, चाचा,ताऊ ) से वंचित होगी

जागो वैश्य समाज के लोगो जागो....

सभी वैश्य वर्ग इस समस्या को अधिक विकराल ना होने दे , अपनी व्यक्तिगत समस्या समझकर आपस में एक दूसरे से शेयर करें , हर पल चिंतन व मंथन करें और सही मार्गदर्शन कर समाज को बचाने का प्रयास करें । स्वयं सुखी रहे तभी समाज सुखी और संपन्न होगा

फ्रेंड्स आपको यह पोस्ट कैसी लगी कृपया कमेंट में बताएं और अपने सभी वैश्य समाज को शेयर करें

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